बेंगलुरु: 18 जुलाई, 2024 – PhonePe के CEO Sameer Nigam का एक ट्वीट सोशल मीडिया पर तूफान मचा रहा है। यह विवाद तब शुरू हुआ जब उन्होंने एक ट्वीट में कहा कि कर्नाटक केवल कन्नड़ भाषी लोगों के लिए नहीं है और वह भारत में कहीं भी काम कर सकते हैं। उनके इस बयान ने कर्नाटक में भाषा और रोजगार को लेकर एक नई बहस को जन्म दे दिया है।
ट्वीट का मूल कारण
Sameer Nigam ने अपने ट्वीट में लिखा, “Karnataka <> only Kannada speaking people. Get it? I can work wherever I want in India. I can learn any language that I want to. The constitution of India gives me these rights. IT’S MY CHOICE. Get the hue and cry.” इस ट्वीट का मकसद यह बताना था कि भारत के संविधान के तहत सभी नागरिकों को कहीं भी काम करने और किसी भी भाषा को सीखने का अधिकार है।
सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाएं
Sameer Nigam के इस बयान पर सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं आई हैं। कई लोगों ने इसे कर्नाटक के स्थानीय लोगों और उनकी भाषा के प्रति असम्मानजनक बताया है। इसके चलते #BoycottPhonePe, #Kannadiga, #uninstallphonepe, #KarnatakaJobsForKannadigas, और #Bengaluru जैसे हैशटैग्स ट्रेंड करने लगे हैं।
कन्नड़ समर्थकों की नाराजगी
कर्नाटक में कई लोगों का मानना है कि राज्य में स्थानीय भाषा और संस्कृति को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। वे कहते हैं कि बाहरी लोग यहां आकर रोजगार के अवसर छीन रहे हैं और स्थानीय लोगों को पीछे धकेल रहे हैं। इस विवाद के बाद कई कन्नड़ संगठनों ने Sameer Nigam और PhonePe के खिलाफ प्रदर्शन भी किया है।
कर्नाटक के राजनेताओं की प्रतिक्रिया
कर्नाटक के कई राजनेताओं ने भी इस विवाद पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। कुछ ने कहा है कि सभी भारतीयों को भारत के किसी भी कोने में काम करने का अधिकार है, जबकि कुछ ने कहा है कि राज्य की भाषा और संस्कृति का सम्मान किया जाना चाहिए।
संविधान के अधिकार और समाज
इस विवाद ने एक बार फिर से संविधान में दिए गए अधिकारों और समाज में उनकी व्यावहारिकता पर चर्चा को जन्म दिया है। भारतीय संविधान सभी नागरिकों को कहीं भी बसने और काम करने का अधिकार देता है। लेकिन, क्या यह अधिकार स्थानीय संस्कृति और भाषा के सम्मान के साथ संतुलित हो सकता है, यह एक बड़ा सवाल है।
अंतिम विचार
Sameer Nigam का यह ट्वीट और उस पर हुआ विवाद हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि आधुनिक भारत में भाषा और संस्कृति के महत्व को कैसे संतुलित किया जा सकता है। जहां एक ओर हमें संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों का सम्मान करना चाहिए, वहीं दूसरी ओर स्थानीय भाषाओं और संस्कृतियों का भी सम्मान आवश्यक है।
इस विवाद का अंत क्या होगा, यह तो समय ही बताएगा, लेकिन यह निश्चित है कि इसने भाषा, संस्कृति और अधिकारों के बीच के संबंध पर एक महत्वपूर्ण बहस को जन्म दिया है।
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